शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

"गायत्री मंत्र" की सम्पूर्ण वैज्ञानिक विश्लेषण महत्व, अर्थ, साधना प्रकार, लाभ सहित समस्त पक्ष

गायत्री मंत्र को हिन्दू धर्म में सबसे उत्तम मंत्र माना जाता है. यह मंत्र हमें ज्ञान प्रदान करता है. इस मंत्र का मतलब है - हे प्रभु, क्रिपा करके हमारी बुद्धि को उजाला प्रदान कीजिये और हमें धर्म का सही रास्ता दिखाईये. यह मंत्र सूर्य देवता (सवितुर) के लिये प्रार्थना रूप से भी माना जाता है।
गायत्री मन्त्र हिन्दूओं का मूल मंत्र है, विशेषकर उनका जो जनेऊ धारण करते हैं। इस मंत्र के द्वारा वे देवी का आह्वान करते हैं। यह मंत्र सूर्य भगवान को समर्पित है। इसलिए इस मंत्र को सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पढ़ा जाता है। वैदिक शिक्षा लेने वाले युवकों के उपनयन और जनेऊ संस्कार के समय भी इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है। ऐसी शिक्षा को 'गायत्री दीक्षा' कहा जाता है।

ॐ भूर्भुवः स्व:
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्यः धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात् ।
हे प्रभु! आप हमारे जीवन के दाता हैं
आप हमारे दुख़ और दर्द का निवारण करने वाले हैं
आप हमें सुख़ और शांति प्रदान करने वाले हैं
हे संसार के विधाता
हमें शक्ति दो कि हम आपकी उज्जवल शक्ति प्राप्त कर सकें
क्रिपा करके हमारी बुद्धि को सही रास्ता दिखायें

मंत्र के प्रत्येक शब्द की व्याख्या
गायत्री मंत्र के पहले नौं शब्द प्रभु के गुणों की व्याख्या करते हैं
ॐ = घेर
भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाला
भुवः = दुख़ों का नाश करने वाला
स्वः = सुख़ प्रदाण करने वाला
तत = वह, सवितुर = सूर्य की भांति उज्जवल
वरेण्यं = सबसे उत्तम
भर्गो = कर्मों का उद्धार करने वाला
देवस्य = प्रभु
धीमहि = आत्म चिंतन के योग्य (ध्यान)
धियो = बुद्धि, यो = जो, नः = हमारी, प्रचोदयात् = हमें शक्ति दें (प्रार्थना)

इस प्रकार से कहा जा सकता है कि गायत्री मंत्र में तीन पहलूओं क वर्णन है - स्त्रोत, ध्यान और प्रार्थना ।

सबसे पवित्र मन्त्र
'गायत्री', 'सावित्री' और 'सरस्वती' एक ही ब्रह्मशक्ति के नाम हैं। इस संसार में सत-असत जो कुछ हैं, वह सब ब्रह्मस्वरूपा गायत्री ही हैं। भगवान व्यास कहते हैं- "जिस प्रकार पुष्पों का सार मधु, दूध का सार घृत और रसों का सार पय है, उसी प्रकार गायत्री मन्त्र समस्त वेदों का सार है। गायत्री वेदों की जननी और पाप-विनाशिनी हैं, गायत्री मन्त्र से बढ़कर अन्य कोई पवित्र मन्त्र पृथ्वी पर नहीं है। गायत्री मन्त्र ऋक्, यजु, साम, काण्व, कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय आदि सभी वैदिक संहिताओं में प्राप्त होता है, किन्तु सर्वत्र एक ही मिलता है। इसमें चौबीस अक्षर हैं।

महत्त्व
गायत्री सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम मंत्र है। जो कार्य संसार में किसी अन्य मंत्र से हो सकता है, गायत्री से भी अवश्य हो सकता है। इस साधना में कोई भूल रहने पर भी किसी का अनिष्ट नहीं होता, इससे सरल, श्रम साध्य और शीघ्र फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है। समस्त धर्म ग्रंथों में गायत्री की महिमा एक स्वर में कही गयी है। अथर्ववेद में गायत्री को आयु, विद्या, संतान, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली कहा गया है। विश्वामित्र ऋषि ने कहा है, "गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है। संपूर्ण वेद, यज्ञ, दान, तप गायत्री की एक कला के समान भी नहीं हैं।"

24 अक्षर
गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में अनेक ज्ञान-विज्ञान छिपे हुए हैं। गायत्री साधना द्वारा आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है और अनेक ऋद्धि-सिद्धियां परिलक्षित होने लगती हैं। गायत्री उपासना से तुरंत आत्मबल बढ़ता है। गायत्री साधना एक बहुमूल्य दिव्य संपत्ति है। इस संपत्ति को इकट्ठी करके साधक उसके बदले में सांसारिक सुख एवं आत्मिक आनन्द भली प्रकार प्राप्त कर सकता है। गायत्री के 24 अक्षरों का गुंथन ऐसा विचित्र एवं रहस्यमय है कि उनके उच्चारण मात्र से जिव्हा, कंठ, तालु एवं मूर्धा में अवस्थित नाड़ी तंतुओं का एक अद्भुत क्रम में संचालन होता है। इस प्रकार गायत्री के जप से अनायास ही एक महत्वपूर्ण योग साधना होने लगती है और उन गुप्त शक्ति केंद्रों के जागरण से आश्चर्यजनक लाभ मिलने लगता है।

भगवान का नारी स्वरूप 'गायत्री'
'गायत्री' भगवान का नारी रूप है। भगवान की माता के रूप में उपासना करने से दर्पण के प्रतिबिम्ब एवं कुएं की आवाज़ की तरह वे भी हमारे लिए उसी प्रकार प्रत्युत्तर देते हैं। गायत्री को "भूलोक की कामधेनु" कहा गया है। गायत्री को 'सुधा' भी कहा गया है, क्योंकि जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाकर सच्चा अमृत प्रदान करने की शक्ति से वह परिपूर्ण हैं। गायत्री को 'पारसमणि' कहा गया है, क्योंकि उसके स्पर्श से लोहे के समान कलुषित अंत:करणों का शुद्ध स्वर्ण जैसा महत्वपूर्ण परिवर्तन हो जाता है। गायत्री को 'कल्पवृक्ष' कहा गया है, क्योंकि इसकी छाया में बैठकर मनुष्य उन सब कामनाओं को पूर्ण कर सकता है जो उसके लिए उचित एवं आवश्यक है। श्रद्धापूर्वक गायत्री माता का आंचल पकड़ने का परिणाम सदा कल्याणपरक होता है। गायत्री को 'ब्रह्मास्त्र' कहा गया है, क्योंकि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। इसका प्रयोग कभी भी व्यर्थ नहीं होता है।

साधना के नियम
गायत्री साधना के नियम बहुत सरल हैं। स्नान आदि से शुद्ध होकर प्रात:काल पूर्व की ओर, सायंकाल पश्चिम की ओर मुंह करके, आसन बिछाकर जप के लिए बैठना चाहिए। पास में जल का पात्र तथा धूपबत्ती जलाकर रख लेनी चाहिए। जल और अग्नि को साक्षी रूप में समीप रखकर जप करना उत्तम है। आरम्भ में गायत्री के चित्र का पूजन अभिवादन या ध्यान करना चाहिए, पीछे जप इस प्रकार आरम्भ करना चाहिए कि कंठ से ध्वनि होती रहे, होंठ हिलते रहें, पर पास बैठा हुआ भी दूसरा मनुष्य उसे स्पष्ट रूप से न सुन समझ सके। तर्जनी उंगली से माला का स्पर्श करना चाहिए।
क माला पूरी होने के बाद उसे उलट देना चाहिए। कम से कम 108 मंत्र नित्य जपने चाहिए। जप पूरा होने पर पास में रखे हुए जल को सूर्य के सामने अर्घ्य चढ़ा देना चाहिए। रविवार गायत्री का दिन है, उस दिन उपवास या हवन हो सके तो उत्तम है।



गायत्री मंत्र : सबसे बड़ा वैज्ञानिक मंत्र

गायत्री मन्त्र का अर्थ है उस परम सत्ता की महानता की स्तुति जिसने इस ब्रह्माण्ड को रचा है । यह मन्त्र उस ईश्वरीय सत्ता की स्तुति है जो इस संसार में ज्ञान और और जीवन का स्त्रोत है, जो अँधेरे से प्रकाश का पथ दिखाती है । गायत्री मंत्र लोकप्रिय यूनिवर्सल मंत्र के रूप में जाना जाता है. के रूप में मंत्र किसी भी धर्म या एक देश के लिए नहीं है, यह पूरे ब्रह्मांड के अंतर्गत आता है। यह अज्ञान को हटा कर ज्ञान प्राप्ति की स्तुति है । मन्त्र विज्ञान के ज्ञाता अच्छी तरह से जानते हैं कि शब्द, मुख के विभिन्न अंगों जैसे जिह्वा, गला, दांत, होठ और जिह्वा के मूलाधार की सहायता से उच्चारित होते हैं । शब्द उच्चारण के समय मुख की सूक्ष्म ग्रंथियों और तंत्रिकाओं में खिंचाव उत्पन्न होता है जो शरीर के विभिन्न अंगों से जुडी हुई हैं । योगी इस बात को भली प्रकार से जानते हैं कि मानव शरीर में संकड़ों दृश्य -अदृश्य ग्रंथियां होती है जिनमे अलग अलग प्रकार की अपरिमित उर्जा छिपी है । अतः मुख से उच्चारित हर अच्छे और बुरा शब्द का प्रभाव अपने ही शरीर पर पड़ता है । पवित्र वैदिक मंत्रो को मनुष्य के आत्मोत्थान के लिए इन्ही नाड़ियों पर पड़ने वाले प्रभाव के अनुसार रचा गया है ।

शरीर में षट्चक्र हैं जो सात उर्जा बिंदु हैं - मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहद चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र एवं सहस्त्रार चक्र ये सभी सुषुम्ना नाड़ी से जुड़े हुए है । गायत्री मन्त्र में २४ अक्षर हैं जो शरीर की २४ अलग अलग ग्रंथियों को प्रभावित करते हैं और व्यक्ति का दिव्य प्रकाश से एकाकार होता है । गायत्री मन्त्र के उच्चारण से मानव शरीर के २४ बिन्दुओं पर एक सितार का सा कम्पन होता है जिनसे उत्पन्न ध्वनी तरंगे ब्रह्माण्ड में जाकर पुनः हमारे शरीर में लौटती है जिसका सुप्रभाव और अनुभूति दिव्य व अलौकिक है। ॐ की शब्द ध्वनी को ब्रह्म माना गया है । ॐ के उच्च्यारण की ध्वनी तरंगे संसार को, एवं ३ अन्य तरंगे सत, रज और तमोगुण क्रमशः ह्रीं श्रीं और क्लीं पर अपना प्रभाव डालती है इसके बाद इन तरंगों की कई गूढ़ शाखाये और उपशाखाएँ है जिन्हें बीज-मन्त्र कहते है ।

गायत्री मन्त्र के २४ अक्षरों का संयोजन और रचना सकारात्मक उर्जा और परम प्रभु को मानव शरीर से जोड़ने और आत्मा की शुद्धि और बल के लिए रचा गया है । गायत्री मन्त्र से निकली तरंगे ब्रह्माण्ड में जाकर बहुत से दिव्य और शक्तिशाली अणुओं और तत्वों को आकर्षित करके जोड़ देती हैं और फिर पुनः अपने उदगम पे लौट आती है जिससे मानव शरीर दिव्यता और परलौकिक सुख से भर जाता है । मन्त्र इस प्रकार ब्रह्माण्ड और मानव के मन को शुद्ध करते हैं। दिव्य गायत्री मन्त्र की वैदिक स्वर रचना के प्रभाव से जीवन में स्थायी सुख मिलता है और संसार में असुरी शक्तियों का विनाश होने लगता है । गायत्री मन्त्र जाप से ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है । गायत्री मन्त्र से जब आध्यात्मिक और आतंरिक शक्तियों का संवर्धन होता है तो जीवन की समस्याए सुलझने लगती है वह सरल होने लगता है । हमारे शरीर में सात चक्र और 72000 नाड़ियाँ है, हर एक नाडी मुख से जुडी हुई है और मुख से निकला हुआ हर शब्द इन नाड़ियों पर प्रभाव डालता है । अतः आइये हम सब मिलकर वैदिक मंत्रो का उच्चारण करें .. उन्हें समझें और वेद विज्ञान को जाने । भारत वर्ष का नव-उत्कर्ष सुनिश्चित करें । गायत्री मंत्र ऋग्वेद के छंद 'तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्' 3.62.10 और यजुर्वेद के मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः से मिलकर बना है।

गायत्री मन्त्र का सूर्य विज्ञान
प्रत्येक वेद मन्त्र का एक देवता होता है जिसकी शक्ति से मन्त्र फलित और सिद्ध होता है । गायत्री महामंत्र का देवता सविता या सूर्य है। गायत्री मन्त्र की शक्ति सूर्य पर ही अवलंबित है । गर्मी, प्रकाश और रेडिएशन सूर्य की स्थूल शक्ति है इसके अलावा समस्त प्राणियों को उत्पान करने , उनके पोषण करने और अभिवर्धन करने की जीवनी-शक्ति उसकी सूक्ष्म शक्ति है।

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आध्यात्म विज्ञान में प्रकाश की साधना और प्रकाश की याचना की चर्चा मिलती है। यह प्रकाश किसी बल्ब, बत्ती, दीपक,सूर्य या चन्द्र से निकलने वाला नहीं वरन परम ज्योति है जो इस विश्व में चेतना बन कर जगमगा रही है। गायत्री के उपास्य सविता भी इसी परम ज्योति को कहते हैं। इसका अस्तित्व ऋतंभरा [metaphysical] प्रतीक के रूप में सृष्टि के कण-कण में हैं। इसकी जितनी अधिक मात्र जिसके भीतर होगी उसमें उतना ही दिव्य अंश आलोकित होगा।
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गायत्री महामंत्र का देवता सूर्य महाप्राण है जो जड़ जगत में परमाणु और चेतन जगत में चेतना बन कर तरंगित है। सूर्य के माध्यम से प्रस्फुटित होने वला महाप्राण इश्वर का वह अंश है जिससे इस अखिल सृष्टि का संचालना होता है।
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सूर्य का सूक्ष्म प्रभाव शारीर के अलावा सूर्य मन और बुद्धि को भी प्रभावित करता है। इसलिए गायत्री मन्त्र द्वरा बुद्धि को सत्मार्ग की और प्रेरित करने की प्रार्थना सूर्य से की जाती है।
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गायत्री मंत्र एक महामंत्र हैं जो प्रत्येक मन्त्र साधक और मंत्र के अधिष्ठाता - देव -सूर्य के मध्य एक अदृश्य सेतु का कार्य करता हैं । जब हम गायत्री -मंत्र का क्रमबद्ध, लयबद्ध और वृताकार क्रम से जाप करतें हैं तो ब्रह्माण्ड के मानस -माध्यम में एक विशिष्ट प्रकार की असाधारण तरंगें उठती हैं जो स्प्रिंगनुमा- पथ spiral -cirulatory –path का अनुगमन करती हुई सूर्य तक पहुँचती हैं | और उसकी प्रतिध्वनी BOOMERANG या प्रत्यावर्ती - बाण के पथ के सामान लौटतें समय सूर्य की दिव्यता,प्रकाश,तेज, ताप और अन्य आलोकिक गुणों से युक्त होती हैं और साधक को इन दिव्य - अणुओं से भर देतीं हैं. साधक शारीरिक,मानसिक और अध्यात्मिक रूप से लाभान्वित होता हैं.
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गायत्री मन्त्र द्वारा हम अपने अन्दर के काले, मटमैले और पापाचरण को प्रोत्साहन देने वाले प्रकाश अणुओं को दिव्य, तेजस्वी, सदाचरण, शांति और प्रसन्ता की वृद्धि करने वाले मानव-अणुओं में परिवर्तित करते हैं। विकास की इस प्रक्रिया में किसी नैसर्गिक तत्व, पिंड या गृह-नक्षत्र की सांझेदारी होती है। जैसे गायत्री मन्त्र की उपासना से हमारे भीतर के दूषित प्रकाश अणु को हटाने और उनके स्थान पर दिव्य प्रकाश अणु भरने का माध्यम गायत्री का देवता सविता अर्थात सूर्य होता है।
गायत्री विज्ञान ही सूर्य विज्ञान है ।सूर्य विज्ञान के अनुसार सभी पदार्थ सूर्य रश्मि वर्णमाला के विभिन्न प्रकार के संयोगों से उत्पन्न होते हैं। सभी पदार्थ इस वातावरण में उपस्थित हैं कुछ व्यक्त हैं और कुछ अव्यक्त , गायित्री के उच्च कोटि साधना से व्यक्त को अव्यक्त और अव्यक्त को व्यक्त किया जा सकता है। सूर्य रश्मि वर्णमाला को भली भांति जान कर प्रकृति और पदार्थों में परिवर्तन, विधटन और संगठन करने की समर्थ प्राप्त की जा सकती है | सूर्य रश्मियों के माध्यम से अणुओं में परिवर्तन लाया जा सकता है और एक अणु का दूसरे अणु में रूपांतरित किया जाना संभव होता है ।
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गायत्री मन्त्र के प्रभाव
सूर्य परब्रह्म की प्रत्यक्ष प्रतीक प्रतिमा है। यह जड़ और और चेतन के अस्तितिव को बनाये रखता है। पञ्च प्राण उसी से आते है। उसकी आराधना से हम अपने आन्तरिक चुम्बकत्व संकल्प शक्ति से अभिष्ट मात्र में अभिष्ट स्तर के प्राण आकर्षित और धारण कर सकते हैं।
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गायत्री उपासना से सूर्य के विद्युत-चुम्बकीय प्रवाह से पीनल ग्रंथि का सम्बन्ध जुड़ जाता है और सूर्य तेज के कण हमारे शरीर में प्रवेश करते चले जातें है | इस प्रकार प्राण शरीर विकसित होते जाता है और सूर्य प्रकाश के सामान हल्का , दिव्य और तेजस्वी होता जाता है।
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सर्प्रथम अनुभव होता है -भ्रूमध्य यानि दोनों भोहों के बीच प्रकाश का अनुभव होना । कुछ समय बाद व्यक्ति की नींद और भूख में क्रमशः कमी आना।मन का स्वतः ही शांत होना। लम्बे समय के जाप के बाद दोनों स्वर -इडा और पिंगला का साथ-साथ चलना । गायत्री मन्त्र के द्वारा विचार संशोधन और भावनात्मक परिष्कार होता है |
गायत्री मन्त्र जाप से मस्तिष्क के दोनों हेमीस्फेरिक सिमिट्री पर प्रभाव पड़ता है | दायें और बाये दोनों गोलार्ध अपनी उन्नत अवस्था में आ जाते हैं और दोनों के क्रियाकलाप के मध्य अधिक सामंजस बैठ जाता है।
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गायत्री मन्त्र का प्रभाव सोलर-प्लेक्सस में भी होने से त्वचा की प्रतिरोधी क्षमता भी असाधारण रूप से बढती जाती है।
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स्थूल शरीर [physical body]
स्थूल शरीर में सूर्य की किरणें आरोग्य, तेज, बल ,स्फूर्ति, ओज ,उत्साह,आयुष पुरषार्थ बलवर्धन करती हैं | शरीर के समस्त अंग-प्रत्यंग सविता की किरणों द्वारा लाभान्वित होते हैं। सभी परिपुष्ट और क्रियाशील बनतें हैं।

सूक्ष्म शरीर [subtle body]
सूक्ष्म शरीर मस्तिष्क प्रदेश में उसका प्रवेश बुद्धि, वैभव और प्रज्ञा उत्साह ,स्फूर्ति,प्रफुल्लता,साहस ,एकाग्रता, स्थिरता, धेर्य,संयम अनुदान की वर्षा करता है।

कारण शरीर [casual body]
कारण शरीर यानि ह्रदय प्रदेश में भावना, श्रद्धा, त्याग, तपस्या, श्रद्धा, प्रेम,उपकार,विवेक,दया और विश्वास और सद्भावना की वृद्धि करता है।
अंधकार रूपी विकार , इस प्रकाश से तिरोहित होता है, व्यक्तित्व निखरता है और स्थूल शरीर को ओजस, सूक्ष्म शरीर को तेजस और कारण शरीर को वर्चस्व उपलब्ध होता है।
जैसे गाय सब पशुओं में, गंगा सब नदियों में तुलसी सब औषधियों में विशेष लाभकारी है वैसे ही गायत्री शक्ति समस्त ईश्वरीय देव -शक्तियों में अधिक उपयोगी है।
यधपि किसी मन्त्र की शक्ति को न्यून तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन महामंत्र गायत्री को यह कहना पड़ता है की यह सर्वोपरी मन्त्र विपुल शक्ति संपन्न अपने में एक विशेष विलक्षणता रखता है।

गायत्री मंत्र पर महापुरुषों के विचार

"गायत्री मंत्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने और आत्माओं की उन्नति के लिऐ उपयोगी है। गायत्री का स्थिर चित्त और शान्त ह्रुदय से किया हुआ जप आपत्तिकाल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है।" -महात्मा गाँधी

"ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमको दिऐ हैं, उनमें से ऐक अनुपम रत्न गायत्री से बुद्धि पवित्र होती है।" -महामना मदन मोहन मालवीय

"भारतवर्ष को जगाने वाला जो मंत्र है, वह इतना सरल है कि ऐक ही श्वाँस में उसका उच्चारण किया जा सकता है। वह मंत्र है गायत्री मंत्र।" -रवींद्रनाथ टैगोर

"गायत्री में ऍसी शक्ति सन्निहित है, जो महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकती है।" -योगी अरविंद

"गायत्री का जप करने से बडी‍-बडी सिद्धियां मिल जाती हैं। यह मंत्र छोटा है, पर इसकी शक्ति भारी है।" -स्वामी रामकृष्ण परमहंस

"गायत्री सदबुद्धि का मंत्र है, इसलिऐ उसे मंत्रो का मुकुटमणि कहा गया है।" -स्वामी विवेकानंद

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